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काशीपुर। “समय भी कर्मफल को नहीं भूलता”—यह विचार स्वामी नित्यानंद गिरी जी महाराज के आध्यात्मिक संदेश से प्रेरित होकर काशीपुर निवासी वेद प्रकाश विद्यार्थी भैया ने अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर व्यक्त किए हैं। उनका कहना है कि मनुष्य को अपने प्रत्येक कर्म के प्रति सजग रहना चाहिए, क्योंकि किए गए कर्मों का फल उसे किसी न किसी रूप में भोगना पड़ता है।विद्यार्थी भैया बताते हैं कि उनका जन्म वर्ष 1950 में काशीपुर की धरती पर हुआ। जीवन के लगभग 76 वर्षों के सफर में उन्हें विभिन्न स्थानों पर जाने और अलग-अलग लोगों के साथ रहने तथा उनसे मिलने का अवसर मिला। वे बताते हैं कि उन्होंने नगर पालिका के स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और आगे चलकर ऐसे लोगों के बीच भी रहे, जिन्होंने अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त की थी। उनके अनुसार, परिस्थितियां चाहे जैसी रही हों, उन्हें आगे बढ़ने में अपने आराध्य श्री हनुमान जी का आशीर्वाद और विश्वास हमेशा सहारा देता रहा।कर्मों को सीसी कैमरे की तरह समझने की जरूरतविद्यार्थी भैया का कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे मनुष्य में भी परमात्मा का स्वरूप देखना चाहिए। उनका मानना है कि मनुष्य को अपने कर्मों को इस प्रकार समझना चाहिए, जैसे उसके प्रत्येक कार्य की रिकॉर्डिंग किसी सीसी कैमरे में हो रही हो।वे कहते हैं कि यदि व्यक्ति यह भावना रखे कि वह जो भी करेगा, उसका परिणाम उसे स्वयं ही भोगना पड़ेगा, तो वह गलत कार्यों से बचने और अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित होगा। उनके अनुसार, सांसारिक रिश्ते और भौतिक परिस्थितियां हमेशा साथ नहीं रहतीं, अंततः मनुष्य को अपने कर्मों के परिणामों का सामना स्वयं करना पड़ता है।जीवन के अनुभवों से मिली कर्मफल की सीखविद्यार्थी भैया कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में अनेक लोगों को उनके कर्मों के परिणामों का सामना करते हुए देखा है। इन्हीं अनुभवों ने उन्हें इस निष्कर्ष तक पहुंचाया कि मनुष्य को जीवन के अंतिम पड़ाव में अपने भीतर की आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने का प्रयास करना चाहिए।उनका कहना है कि 75 वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति को अपने शेष जीवन को अपने आराध्य के प्रति समर्पित करने की दिशा में बढ़ना चाहिए। इस अवस्था में सांसारिक मोह-माया के बजाय ईश्वर के प्रति विश्वास, श्रद्धा और आत्मचिंतन को महत्व देना चाहिए।वानप्रस्थ आश्रम को लेकर मिला संदेशविद्यार्थी भैया बताते हैं कि उन्होंने एक बार महंत ऋषि श्री श्री 1008 श्रीमान महंत जी महाराज से वानप्रस्थ आश्रम में जीवन कैसे व्यतीत करना चाहिए, इस संबंध में मार्गदर्शन मांगा था। उनके अनुसार, उन्हें सरल जीवन का संदेश देते हुए कहा गया कि जो भोजन मिल जाए, उसे प्रसाद समझकर ग्रहण करो और जो वस्त्र पहनने को मिलें, उन्हें स्वीकार करो।विद्यार्थी भैया के अनुसार, भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मानव जीवन को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। उनका विश्वास है कि 84 लाख योनियों के चक्र से मुक्ति के लिए मानव जीवन एक महत्वपूर्ण अवसर है। इसलिए जीवन के उत्तरार्ध में व्यक्ति को अपने आराध्य के प्रति पूर्ण विश्वास, श्रद्धा और समर्पण की भावना विकसित करनी चाहिए।आत्मा को जागृत करना ही जीवन का उद्देश्य”विद्यार्थी भैया का कहना है कि संसार में निरंतर भटकने से मनुष्य की आत्मिक शांति प्राप्त नहीं होती। इसके लिए उसे अपने भीतर झांकना होगा और आत्मचिंतन के माध्यम से अपनी चेतना को जागृत करना होगा।उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन में अच्छे कर्म करने, दूसरों के प्रति सद्भाव रखने और अपने आराध्य पर विश्वास बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। उनके अनुसार, जब व्यक्ति अपने जीवन को ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से जीता है, तभी उसके भीतर की आध्यात्मिक भूख शांत होने की दिशा में कदम बढ़ता है।समय बीत जाता है, लेकिन कर्मों की छाप बनी रहती है। इसलिए जीवन में ऐसे कर्म करें, जिनका परिणाम स्वयं भी स्वीकार किया जा सके और जिनसे समाज तथा मानवता का कल्याण हो।” वेद प्रकाश विद्यार्थी भैया
काशीपुर महानगर, जनपद ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंडअगर इसे आप और ज्यादा अखबारनुमा, भावनात्मक या आध्यात्मिक कॉलम शैली में चाहते हैं, तो उसी सामग्री का दूसरा संस्करण भी बनाया जा सकता है।

By Mohd Nafees

संपादक – सच्चाई की जीत पता – Nafees Screen Printers, Near Bilal Masjid, Ward no. 10, Ali Khan, Kashipur 244713 संपर्क – 9837427792 व्हाट्सप्प – 9837427792 ईमेल – sachchaikijeet7@gmail.com

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