काशीपुर, उधम सिंह नगर। आध्यात्मिक चिंतन के दौरान यह विचार व्यक्त किया गया कि किसी साधु या संत का मूल्यांकन उसके रंग, जाति, आयु अथवा शिक्षा के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। भगवान की भक्ति में इन बाहरी बातों का कोई महत्व नहीं होता। सच्ची साधुता व्यक्ति के आचरण, त्याग, सेवा और आध्यात्मिक साधना से पहचानी जाती है। हाल ही में एक आध्यात्मिक चर्चा के दौरान श्री गंगे बाबा उदासीन अखाड़ा आश्रम में पूज्य महंत दयानंद जी महाराज के सान्निध्य में इस विषय पर संवाद हुआ। चर्चा के दौरान प्रश्न किया गया कि क्या केवल गेरुआ वस्त्र धारण करने से ही कोई व्यक्ति संन्यासी बन जाता है, अथवा बिना गेरुआ वस्त्र पहने भी संन्यास के आदर्शों का पालन किया जा सकता है। इस पर महंत दयानंद जी महाराज ने कहा कि संन्यास केवल वस्त्रों से नहीं, बल्कि जीवन की साधना, त्याग, अनुशासन और वैराग्य से परिभाषित होता है। उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति संन्यासी जैसी जीवनशैली अपना सकता है और आध्यात्मिक मूल्यों का पालन कर सकता है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि साधु-संतों के प्रति सम्मान रखते हुए उनके बाहरी स्वरूप के बजाय उनके विचारों, चरित्र और समाज के प्रति योगदान को महत्व दिया जाए।
विधार्थी भैया
काशीपुर महानगर, जनपद उधम सिंह नगर, उत्तराखंड।

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