दिनांक 14 अक्टूबर बरोज बुधवार को बरेली शरीफ में मसलक ए आला हजरत इमाम अहमद रजा खान का 102 उर्स ए पाक मनाया गया
उर्स के मौके पर नूर मोहम्मद जमाली ने बताया
इमाम अहमद रज़ा खान फाज़िले बरेलवी रज़ी अल्लाहो तआला अन्हा की पैदाइश शहर बरेली के मुहल्ला सौदागरान में रहने वाले एक बड़े आलिम मौलाना मुहम्मद नक़ी अली खान के घर 10 शव्वाल 1272 हिजरी व मुताबिक 14 जून सन 1856 ईसवी यानी हिंदुस्तान की पहली जंग ए आज़ादी से 1 साल पहले हुई।आपने अपनी ख़ुदादाद सलाहियत से सिर्फ 4 साल की उम्र में कुरान का नाज़रा मुकम्मल किया, 6 साल की उम्र में 12 रबी उल अव्वल के मौके पर बेहतरीन तक़रीर की, सिर्फ़ 8 साल की उम्र में दर्से निज़ामी में पढ़ाई जाने वाली किताब हिदायत अल नहव की अरबी ज़बान में शरह (व्याख्या) लिखने के साथ ही सिर्फ़ 13 साल 10 महीने की उम्र में तमाम उलूमो फुनून से फराग़त पाते हुए फत्वे लिखने का काम भी शुरू कर दिया।आप जो कुछ पढ़ते या सुन लेते उसे ज़बानी याद रखते, अपने उस्तादों से भी आप कोई किताब सिर्फ तिहाई चौथाई ही पढ़ते बाक़ी पूरी ख़ुद पढ़ लेते थे।यूं तो आप दीनी आलिम थे मगर आपने दुनियावी उलूम में भी बड़ी महारत हासिल कर रखी थी।आप का रियाज़ी (बीजगणित) वगैरह की पहेलियां चुटकियों में हल कर देना देखकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ सर ज़ियाउद्दीन जो खुद भी रियाज़ी के प्रोफेसर थे आपके क़ायल बन गए थे। नूर मोहम्मद जमाली ने कहा
बताया जाता है कि इमाम अहमद रज़ा को 55 उलूमो फुनून में हासिल महारत जैसे कई मामलात में अपने दौर के आलिमों पर फौकियत होने से आला हजरत का खिताब दिया गया था।वैसे आपने सबसे आला ओ आला हमारा नबी, सबसे बाला ओ बाला हमारा नबी लिखकर अपने इस खिताब पर बाद में होने वाली तमाम बहसों का ख़ात्मा ख़ुद ही कर दिया था।आपकी तालीमात नई नस्ल के लिए मशाले राह हैं।आप की लिखी हुई किताबों की फेहरिस्त बहुत बड़ी है जिनमें कुरान और हदीस की तर्जुमानी करता इश्के नबी में डूब कर लिखा नातिया कलाम हदाइके बख्शिश, कुरान का उर्दू तर्जुमा कंज़ुल ईमान, दौराने हज उलमा ए अरब की मांग पर लिखी गई किताब अल्दौलतुल मिल्कियत बिल्मादुल ग़ैबिया और उनके चुनिंदा फत्वों का मजमूआ फतावा ए रज़विया अपनी मिसाल नहीं रखते हैं।जहां फतावा ए रज़विया का साउथ अफ्रीका के सुप्रीम कोर्ट में फैसलों की मदद के लिए सदर मंडेला के हुक्म से रखवाया जाना और दुनिया की टाॅप 100 यूनिवर्सिटीज़ में ऑक्सफोर्ड समेत 20 जगह उनकी ज़ात पर पीएचडी कराया जाना क़ाबिल ए ग़ौर, है वहीं उनके लिखे सलाम “मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम” को अज़ान के बाद मुसलमानों के बीच सबसे ज़्यादा मक़बूलियत मिलना किसी करिश्मे से कम नहीं हैं।
आपने हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम के रोज़ा ए अनवर के अलावा तमाम मज़ारात पर औरतों का जाना बाइस ए लानत करार दिया है।आपने शराबनोशी, सूदखोरी और हराम रोज़ी की अपने खास अंदाज में मज़म्मत की है।शादी, खुशी या शबे बरात के मौके पर की जाने वाली आतिशबाजी, फिजूलखर्ची को भी आपने सख़्त तरीन नाजायज़ बताया है। आप पर लोगों को भले ही जल्दी काफ़िर करार देने का इल्ज़ाम लगाया जाता है लेकिन उनके काफ़िर करार देने की किसी एक दलील को भी आज तक कोई रद्द नहीं कर पाया है।उन्हें हिंदुस्तान में ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ के तामीर कर्दा इस्लामी किले की पासबानी करने और हनफी मसलक को बदअक़ीदगी के हमले से महफूज रखने वाला भी कहा जा सकता है।इमाम अहमद रजा से अक़ीदत रखने वाले तमाम लोग उनकी ख़ूबियों के मद्देनजर हिंदोस्तान की सरकार से भारत रत्न से नवाज़ने की मांग वक्त वक्त पर करते रहे हैं।
इमाम अहमद रज़ा फाज़िल बरेलवी सच्चे आशिके रसूल और बा जमात नमाज़ के ताहयात पाबंद रहने के कोशां रहे।कई बार आपके लिए रेलगाड़ी का भी करामाती तौर पर या तो देर से स्टेशन पहुंचना या नमाज़ के वक़्त रुके रहने का सबूत मिलता है जिससे सफर में भी आप की बाजमाअत नमाज़ नहीं छूट सकी।आपके मुताबिक इंसानों की फलाह और बहबूदगी की अमन के साथ ज़मानत ही सच्चा इस्लाम है।दीन की तब्लीग़ आपने उस पर ख़ुद अमल करके बतौर नमूना (आदर्श) बन कर की है।एक बार आपने अपने नाम गालियां लिखे ख़त को देखकर गुस्सा होने वाले मुरीद को अच्छे आदाब अल्क़ाब लिखे कई ख़त दिखा कर गुस्सा न करने और सब्र करने की ताकीद की।आपके अंदर हुज़ूर की नस्ल यानी सैयदों की क़द्रदानी का ये आलम था कि आपने अपनी पालकी उठाने वाले एक सैयदज़ादे को उसकी ख़ुशबू से पहचान कर पहले उसे पालकी में बिठाकर कंधों पर ढ़ोया फिर अपनी दस्तार उसके कदमों में रख कर अपनी भूल के लिए उससे माफ़ी तलब की।आपका सच्चाई का हुक्म देना और बुराई से रोकना के इस्लामी उसूल पर अमल करते हुए एक सैयद साहब से उनके हाथ में पहनी सोने की अंगूठी उनसे मांग कर उनकी बीवी को उसके वज़न बराबर सोने के ज़ेवर मर्द को सोना न पहनने के हिदायत नामे के साथ भेजना और बरेली में नये तैनात सैय्यद कोतवाल को अपने हाकिम का हुक्म मानने की तरह हुजूर के हुक्म को मानते हुए चेहरे पर दाढ़ी सजाने की बात निराले अंदाज में कह कर उनसे दाढ़ी रखवाना इसका बेहतरीन सबूत हैं।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की तरफ से पिछली सदी के चुनिंदा साइन्सदानों में इमाम अहमद रजा का नाम शामिल होना, ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के ताज़ा एडिशन में लफ्ज़ बरेली का मानी इमाम अहमद रजा की जा ए पैदाइश लिखा होना, आला हजरत के नाम से हज हाउस बनाया जाना, रेल गाड़ी चलाया जाना और चौराहों मार्केटों के नाम उनके नाम पर रखा जाना अपनों के साथ ग़ैरों के दिल में भी उनकी क़द्रो मंज़िलत साबित करता है। इमाम अहमद रजा का विसाल 25 सफर 1340 हिजरी ब मुताबिक 28 अक्टूबर सन् 1921 ई0 को बरेली में हुआ। आपने बरेली में मंजर ए इस्लाम नाम से एक बड़ा दीनी मदरसा भी कायम किया था जो आज भी पूरी शाने इल्मियत के साथ इल्मी खिदमात अंजाम दे रहा है।बरेली में ही आप का मज़ार पुरअनवार है जहां से हमेशा ख़ानकाही और रूहानी फ़ैज़ दुनिया को मिलता रहेगा। आपके बारे में क्या ख़ूब लिखा गया है-

नूर मोहम्मद जमाली मुरादाबाद

By Mohd Nafees

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