इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने संकल्प से जुड़ते हुए अपने नाम दर्ज कराए और संकल्प लिया कि “अगला मंगलवार हमारा है, हमारा है की होड सी लग गई ।”सभी भक्तजनों से आह्वान किया गया कि वे अगले मंगलवार घर के बच्चो के साथ अवश्य आएँ और प्रभु श्री हनुमान जी की कृपा से यह श्रृंखला निरंतर और अटूट बनी रहे। यह संकल्प नई आस्था और नए उत्साह के साथ प्रारंभ किया गया।उर्वशी दत्त बाली ने कहा, कि हमारे सनातन धर्म में करोड़ों देवी-देवता हैं। प्रतिदिन सभी के समक्ष पहुँचना संभव नहीं होता, लेकिन मंगलवार वह पावन दिन है जब हम बच्चो के साथ, हफ़्ते में सिर्फ 20 मिनट प्रभु श्री हनुमान जी के चरणों में एकत्र हो सकते हैं।इसी उद्देश्य से यह संकल्प लिया गया कि—
वर्ष 2026 में प्रत्येक मंगलवार, सर्दियों में सायं लगभग 5:30 बजे, अपने घर के निकट स्थित किसी भी मंदिर में सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ किया जाएगा।संकल्प की शुरुआत 6 जनवरी को मंगलवार के दिन शनि मंदिर परिसर, निकट नागनाथ मंदिर में उर्वशी दत्त बाली के नेतृत्व में हुई। इस अवसर पर हिंदू वाहिनी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव आनंद तिवारी एवं प्रदेश अध्यक्ष रुचिन शर्मा की अगुवाई में संगठन के सदस्यों ने प्रभु श्री हनुमान जी के समक्ष यह संकल्प लिया कि प्रत्येक मंगलवार सभी सनातन धर्मावलंबी एकत्र होकर बजरंग बली के चरणों में उपस्थित होंगे।
शनि मंदिर, निकट नागनाथ मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने, उर्वशी दत्त बाली के साथ सामूहिक हनुमान चालीसा पाठ कर इस प्रेरणादायक संकल्प को नई ऊर्जा प्रदान की।उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि“धर्म हमें लड़ना नहीं जोड़ना सिखाता है।आज हम कोई बड़ा आंदोलन नहीं, बल्कि एक छोटा-सा संकल्प ले रहे हैं,हर मंगलवार अपने बच्चों के साथ प्रभु हनुमान जी के चरणों में बैठने का।
“बच्चों को डाँटकर नहीं, अपने साथ लेकर मंदिर लाया जाता है।
अगर कोई बच्चा मोबाइल छोड़कर मंदिर आ जाए, तो समझिए संस्कार जीत गए।
आज अगर हम बच्चों को धर्म से नहीं जोड़ेंगे, तो कल हमें अपनी संस्कृति ढूँढनी पड़ेगी।”उन्होंने जोर देते हुए कहा कि संस्कार बोले नहीं जाते, बच्चों को दिखाए जाते हैं।संस्कार माँ से मिलते हैं और पिता से मजबूत होते हैं।जब बच्चा पिता का हाथ पकड़कर मंदिर जाता है, तो धर्म मजबूरी नहीं, जीवन का गर्व बन जाता है।माँ संस्कार देती है और पिता उन्हें जीवन में उतारना सिखाता है।”उन्होंने कहा कि आज माँ और पिता दोनों कामकाजी हैं, लेकिन संस्कार देना दोनों की समान जिम्मेदारी है।बच्चा वही करता है जो उसने अपने घर में देखा होता है, अपनी बचपन की जिंदगी को पीछे लौट कर देखें, आज हम जो पूजा पाठ कर रहे हैं, बचपन में हमारे मां-बाप ने सिखाया था,यदि बच्चे आज मोबाइल और टीवी में सुपर पावर हीरो खोज रहे हैं, तो उन्हें हनुमान जी की कथाएँ सुनाइए—उन्हें बताइए कि असली हीरो कौन है।
मंगलवार के सिर्फ 20 मिनट—
बच्चों के भविष्य और संस्कारों के नाम।पिता का आचरण संस्कारों की रीढ़ होता है।
जब बच्चे माता-पिता के साथ मंदिर आते हैं, तो संस्कार अपने आप पनपते हैं।“यह कोई कठिन नियम या दिखावा नहीं, बल्कि भक्ति, एकता और संस्कार की एक छोटी-सी लेकिन अत्यंत शक्तिशाली शुरुआत है।बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने बड़ों को करते हुए देखते हैं।इस अवसर पर राष्ट्रीय महासचिव आनंद तिवारी, प्रदेश अध्यक्ष रुचिन शर्मा ने हिंदू वाहिनी संगठन के साथ संकल्प लिया, कि यह चैन अब टूटने नहीं दी जाएगी,सभी सनातन धर्मावलंबियों, युवाओं एवं बच्चों से इस संकल्प में सहभागी बनने और सनातन धर्म की ज्योति को और अधिक उज्ज्वल करने की अपील की।

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