काशीपुर ।समाजसेवी एवं डी- बाली ग्रुप की डायरेक्टर श्रीमती उर्वशी दत्त बाली समाज में अपने बुजुर्गों के प्रति बदले व्यवहार और आए रूखेपन पर गहरी चोट करती है और कहती है कि हम अपने बुजुर्गों की सेवा उनके जीते जी नहीं करते मगर मरने के बाद उनका श्राद्ध करने का जो तमाशा करते हैं आखिर वह किस काम का है? साक्षात भूखे बुजुर्गों को तो खिलाया नहीं और मरने के बाद अब उन बुजुर्गों को कौवे-कुत्ते और गायों में तलाशा जा रहा है। अब इन पशु पक्षियों में अपने सम्मानित दादा-दादी और माता-पिता को ढूंढा जा रहा है। आखिर सेवा के नाम पर अब यह झूठी नौटंकी क्यों?
श्रीमती उर्वशी दत्त बाली कहती है कि कितनी बड़ी विडंबना है की जो बूढ़े मां-बाप हमारी सेवा के अभाव में भूखे प्यासे चले गए आज उनकी याद में उनकी मृत्यु की तिथि के दिन स्वादिष्ट पकवान बनाए जा रहे हैं और पशु पक्षियों व ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ-साथ दान किया जा रहा है। क्या यह सब करने से हमारे जो पूर्वज भूखे प्यासे चले गए उन्हें यह सब मिल जाएगा ? ज़िंदगी मेंअपनापन नहीं लेकिन मृत्यु के बाद अब यह कैसा दिखावा,, सोचा जाए तो ऐसे श्राद्ध करने की जरूरत है ही नहीं क्योंकि अगर दिल में प्यार ही नहीं है तो यह झूठा पाखंड किसी काम नहीं आएगा क्योंकि भगवान सब देख रहा है,,, जरा सोचिए क्या श्राद्ध पक्ष में एक दिन अपने दिवंगत बड़े बुर्जुगो को कुछ खिला देने से उनकी साल भर की तृप्ति हो जाएगी? समाज की यह विडम्बना हर वर्ष सामने आती है। हर साल श्राद्ध के अवसर पर लोग बड़े-बड़े आयोजन करते हैं, कौवों, गाय , कुत्ते को रिश्तो के नाम दे दे कर रोटी डालते हैं, ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और दिखाते हैं कि वे अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए चिंतित हैं। लेकिन एक सवाल दिल को झकझोरता है,,,जब वही माँ-बाप और बुज़ुर्ग जीवित थे, तब उनकी कितनी सेवा हुई?
कड़वी सच्चाई यह है कि ज़िंदा माँ-बाप को पानी तक नहीं पूछा जाता। उनकी दवाइयों और ज़रूरतों को बोझ समझा जाता है। उनके अकेलेपन को अनदेखा कर दिया जाता है, कह कर टाल दिया जाता है कि हमारे पास समय नहीं है। बच्चे मंदिर में दूध-फल चढ़ाने में तो विश्वास रखते हैं, ,, लेकिन पास ही दो कदम की दूरी पर, दादा-दादी के घर एक कटोरी दाल पहुँचाने का विचार तक उनमें नहीं आता।
सच्चाई यह है कि भगवान को हमसे कुछ नहीं चाहिए, जो इतनी बड़ी दुनिया देख रहे है, एक दर्जन केले या 5 किलो आटे की बोरी हमारे उस भगवान को नहीं चाहिए,, जब हम अपने माँ-बाप या ज़रूरत मंद की सेवा करते हैं, तब ही भगवान प्रसन्न होते हैं। लेकिन अफ़सोस, जैसे ही माता-पिता इस दुनिया से चले जाते हैं, दिखावे के श्राद्ध पर लाखों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं। पंडित जीऔर कौवे का पेट भर जाता है, लेकिन जीते-जी वही माता-पिता भूखे और बेसहारा रह जाते हैं।
श्राद्ध की असली आत्मा मृतक के लिए थाली सजाने में नहीं, बल्कि जीवित लोगों की भूख मिटाने में है।
मरने के बाद पत्तल पर भोजन सजाने से बेहतर है कि उनके जीवित रहते थाली भरी रहे।
अगर सच में पुण्य कमाना है, तो माँ-बाप का सम्मान कीजिए, बुज़ुर्गों की सेवा कीजिए,
यही असली श्रद्धा है और यही असली श्राद्ध है।

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