पूर्व बीएसएफ डीआईजी नरेंद्र नाथ धर दुबे ने अमर उजाला के साथ खास बातचीत में कहा है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में आतंकवादियों की पैरलल आर्मी चल रही है। वहां कई मिसगाइडेड मिसाइल हैं जिनका ट्रिगर उनके हाथ में भी नहीं है। हमको सतर्क रहना पड़ेगा। हम कहीं भी ढीले नहीं पड़ सकते। ऑपरेशन सिंदूर के करीब 88 घंटे बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर की घोषणा हुई। इसके चंद घंटे बाद ही पाकिस्तान की तरफ से हुई फायरिंग और देर रात पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बयान के क्या मायने हैं? आने वाले समय में भारतीय सेनी की क्या रणनीति होनी चाहिए? पहलगाम और 2008 में मुंबई में हुई 26-11 जैसी आतंकी वारदात के बाद सुरक्षाबलों को कैसी सतर्कता  बरतनी चाहिए? पाकिस्तान के नौ आतंकी ठिकानों पर भारतीय सेना ने जैसी कार्रवाई की है, इसका कितना असर हुआ है? ऐसे तमाम सवालों पर  अमर उजाला ने बीएसएफ के पूर्व डीआईजी नरेंद्रनाथ धर दुबे से बात की। अचानक हुआ संघर्ष विराम उल्लंघन चौंकाने वाला है। उन्होंने कहा कि इसके पीछे अमेरिका काम कर रहा था। बारामूला और श्रीनगर में ड्रोन देखे गए हैं, अचानक हुई ये घटना चौंकाने वाली है। श्रीनगर सिटी में हुई घटना विचलित करने वाली है। सभी लोग कयास ही लगा रहे हैं कि ऐसा कैसे हुआ। ग्राउंड रिपोर्ट है कि उल्लंघन हुआ है। दोनों पक्षों से आधिकारिक बयान नहीं आया है। एलओसी पर छोटी-मोटी घटना हो सकती है, लेकिन  ये भी नहीं होनी चाहिए। इसे नजरअंदाज किया जा सकता है। लेकिन श्रीनगर सिटी में हुई घटना चौंकाने वाली है। खुद मुख्यमंत्री का बयान आया है। मैंने खुद ग्राउंड पर वेरिफाई किया है। घटना बिल्कुल सही है। सवाल ये है कि ऐसा क्यों हुआ। कुछ लोग कयास लगा रहे थे कि टेक्निकली जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान का अलग स्टैंड रहा है। कहीं वो इसका लाभ उठाने की ताक में तो नहीं है। लेकिन बाड़मेर में ड्रोन दिखने के बाद ब्लैकआउट होना चौंकाने वाला है। कोई भी इसके निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा है। इसका विश्लेषण किया जा रहा है। कुछ खबरें आ रही हैं कि पाकिस्तान जिसे नॉन-स्टेट एक्टर कहता है, वो मुख्य भूमिका में दिखता है। आतंकी को अगर राजकीय सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक करते हैं तो इसे क्या कहा जाए? उन्होंने कहा नॉन स्टेट एक्टर वह है जिससे सरकार का कोई सरोकार न हो। लेकिन बहावलपुर  और मुरीदके में मारे गए आतंकियों की डेडबॉडी को अगर राजकीय सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक कर रहे हैं, तो इन्हें नॉन स्टेट एक्टर नहीं कहा जा सकता। भारी गोलाबारी हो रही है। उसका जवाब भी दिया जा रहा है। ग्राउंड फोर्सेज हमारी-आपकी तरह पुष्टि नहीं करेंगी। वे 4 का जवाब 14 से दे रहे हैं। बीते चार दिन में परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। पहली ये कि संघर्ष चल रहा है। दूसरा सीजफायर हुआ, उसके बाद सीजफायर तोड़ा गया। परिस्थितियों का पोस्टमार्टम हो रहा होगा, जल्द ही चीजें सामने आएंगी। सुरक्षाबलों को इस बात का पता नहीं था कि सीजफायर होगा। ऐसे में उन्होंने तो अपनी बैरल गरम कर रखी है, इसलिए मुंहतोड़ जवाब दिया जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में क्या हुआ है पिछली रात कितनी तबाही हुई है, पाकिस्तान को अच्छे से पता है। आम लोगों को बहुत चीजें नहीं पता हैं, लेकिन पाकिस्तान ने सीजफायर की बात यूं ही नहीं की है। जब उनका एफ-16 खतरे में पड़ गया, चकलाला से लेकर सरगोधा और रहमियार खान में कार्रवाई हुई। भारतीय सेना ने उनके कुएं की गहराई नाप ली। इसके बाद पड़ोसी को एहसास हो गया कि भारत को हकीकत पता चल गई। ऐसी परिस्थियां क्यों बनीं, अब इस पर विचार चल रहा है। पाकिस्तान दो ही चीजों को लेकर धमकाता था। एक एफ-16 और दूसरा परमाणु था। अगर न्यूक्लियर था तो पांच-छह दिन हो गए, अब तक छोड़ देना चाहिए था। आपका एफ-16  जहां रखा था, हमारी मिसाइल वहां तक पहुंच गई। पूरी बमबारी एरियल है। ऐसे में उन्हें अंदाजा लग गया कि उनके असेट कितने सुरक्षित हैं। एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह तबाह हो चुका है। वे एक भी चीज नहीं गिरा सके। भारत ने जैसा इरादा किया, उस तरह टेरर साइट्स को अटैक किया। जब उन्होंने हमारे नागरिकों को निशाना बनाने का प्रयास किया तो  भारत ने पाकिस्तान के सभी एसेट्स नाकाम कर दिए। इनका एयर डिफेंस सिस्टम संभाल नहीं पाया। सरगोधा और रहमियार खान की नाकामी है। सारी चीजें एक्सपोज हो गईं। भारत ने नई लकीर खींची है। 

रणनीतिक अहमियत समझाते हुए दुबे ने कहा, सरगोधा थोड़ा आंतरिक जगह पर है। यहीं एफ-16 रखे गए हैं। भारत के एसेट्स यहां तक भी पहुंच गए। शनिवार सुबह सात जगहों पर हुआ है। पांच बजे के करीब 192 किलोमीटर की लैंड बाउंड्री पर जमकर गोले पड़े हैं। उनको पता है। नुकसान के बारे में पाकिस्तान कुछ कहेगा नहीं। वे तो जनता को यही बताएंगे कि यहां कुछ हुआ ही नहीं। वे तो आतंकियों को राष्ट्रीय झंडे के साथ सुपुर्द-ए-खाक करने में लगे हैं, ऐसे देश का क्या कहना। इस पर मिली जुली भावनाएं हैं। जो आप कह रहे हैं वो भी एक फैक्टर है। आर्म्ड फोर्स के नुमाइंदे के तौर पर वे कह रहे हैं कि 1965 में अगर भारत ने ताशकंद में पाकिस्तान को हाजी पीर वापस नहीं किया होता तो आज हम इनके सिर पर बैठे होते। 1971 में अगर 93000 सैनिकों को वापस नहीं लिया होता तो शायद आज पीओके भारत के पास होता। कहने का मतलब ये है कि इन बातों पर विचार हर काल में और हर युद्ध के समय चला है। किन परिस्थितियों में सेना के अधिकारी और नेतृत्व समझौते की टेबल पर बैठा? भू-राजनीतिक परिस्थियां कैसी थीं? क्या मजबूरियां थीं? भारत की क्या नीतियां थीं? तमाम पहलुओं को देखते हुए फैसले लिए जाते हैं। 

वर्तमान में जिस तरह का काम पाकिस्तान ने किया है, पहलगाम में जैसी नृशंस हत्या हुई है। जिस तरह देश ने पाकिस्तान के साथ चार  लड़ाइयां लड़ी हैं। इसे लेकर लोगों के दिलो-दिमाग में गुस्सा है। मन में प्रतिशोध की भावना है। मन में ये है कि पाकिस्तान अगर ऐसे ही करता रहेगा तो हम कब तक आपसे बातें करते रहेंगे, जनता काफी गुस्से में है। लोगों के विचार आ रहे हैं कि हम बुद्ध के देश के जरूर हैं, लेकिन इस बार हम पूरे युद्ध के मूड में थे। ऐसे में सवाल ये है कि सरकार जनभावनाओं के आधार पर फैसले नहीं करती। उसे निर्णय लेने से पहले लाभ-हानि देखना होता है। सरकार ने सेना को खुली छूट दी थी। विपक्षी दलों ने भी पूरा समर्थन दिया। संतुलित जवाबी कार्रवाई सेना की नीति रही है। ऐसे में भारत ने नौ आतंकी ठिकानों को बर्बाद करने के लिए चुना गया। इनमें 21 कैंप थे। भारत ने एक ही रात में इनको टारगेट बनाया। पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी परेशानी ये थी कि बहावलपुर और मुरीदके में भारतीय सेना हमला करेगी, उसने इसकी कल्पना नहीं की थी। इन्हीं दोनों जगहों पर जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर के मुख्यालय थे। इसका मतलब है कि पाकिस्तान के दिल पर प्रहार हुआ है। उसके इनर कोर हार्ट पर प्रहार हुआ है, जिसकी उसे उम्मीद नहीं थी। आज तक भारत ने भी जवाबी कार्रवाई के दौरान पीओके को क्रॉस नहीं किया था। बालाकोट में भी ऐसा नहीं हुआ। तत्कालीन नेतृत्व की जो भी नीतियां रही हों। सेना ने पीओके को टच करने का नहीं सोचा था। मारने का सबसे अच्छा टाइम 26/11 था। हमारे 172 लोग मुंबई में मारे गए थे। तब हमने ये काम नहीं किया। ये जो काम अभी हुआ है न ऑपरेशन सिंदूर, ये 26-11 के समय होना चाहिए था। इसी लश्कर ए-तैयबा ने 26-11 हमले को अंजाम दिया था यही पहलगाम हमले में भी शामिल रहा था। 16 साल बाद लश्कर की लीडरशिप बचती नहीं। ये लीडरशिप 2009 में खत्म होनी चाहिए थी, लेकिन 2025 तक जिंदा रही अब उनकी लाशें बहावलपुर जैसी जगहों से आ रही हैं।

By Mohd Nafees

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