उत्तराखंड का ऐतिहासिक और पौराणिक नगर काशीपुर, एक समय औद्योगिक विकास और सांस्कृतिक विविधता के कारण जाना जाता था। लेकिन बीते वर्षों में यहाँ के ऐतिहासिक और पौराणिक स्वरूप को यहाँ की राजनीति ने कहीं पीछे छोड़ दिया। अब यह शहर प्रदेश की राजनीति के अखाड़े के रूप में बदल दिया गया है। ऐसे में विकास की बात सिर्फ कागजों और भाषणों तक, आरोप प्रत्यारोप के बीच उलझ कर रह गयी है।
इधर दीपक बाली सामाजिक जीवन से राजनीति में उतरे और उन्होंने शहर के पौराणिक और ऐतिहासिक स्वरुप को ध्यान में रखते हुए विकास का खाका लोगों के सामने रखा। न केवल खाका रखा वरन उसे क्रियान्वित करते हुए केवल राजनीति के आदी हो चुके शहर के नेताओं और जनता के समक्ष एक नये काशीपुर की परिकल्पना को साकार करना शुरू कर दिया। मेयर बनने के बाद उन्होंने जिस तरह से काम शुरू किया उससे पिछले कई वर्षों से केवल भाषण के आदी शहरवासियों को एक नये काशीपुर की परिकल्पना भाने लगी। ऐसे में राजनीति में नवागंतुक दीपक बाली की कार्यशैली पहले से प्रतिस्थापित नेताओं के लिए असहज हो गई। इसी असहजता की स्थिति में पिछले दो दिनों से काशीपुर की राजनीति काफी गरमा गयी है। खासकर भाजपा के पूर्व विधायक हरभजन सिंह चीमा जो पिछले दो दशकों से शहर की राजनीति का केंद्र बन गये थे।
यहांँ यह कहना गलत नहीं होगा कि पिछले बीस वर्षों से यह शहर विकास की मुख्यधारा से पिछड़ता चला गया। यह स्थिति न केवल स्थानीय जनमानस की उम्मीदों के साथ धोखा है, बल्कि राज्य की राजनीति में विकास के नाम पर होने वाले दिखावे का भी एक कड़वा सच है।
हरभजन सिंह चीमा वर्ष 2002 से 2022 तक लगातार विधायक रहे। उनके पास न केवल भाजपा की सरकार का समर्थन था, बल्कि अनेक बार वे विधायक निधि व राज्य सरकार की योजनाओं के माध्यम से क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे। लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि काशीपुर के बुनियादी ढांचे में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। बीच बीच में उनके द्वारा पत्रकार वार्ता कर अपनी ही सरकार पर विकास को लेकर शिकायत भी की गई। लेकिन विधायक हरभजन सिंह चीमा के कार्यकाल में शहर में आपराधिक तत्वों पर लगाम लगी और शहर के अपराध मुक्त होने की सार्थक प्रयास हुये जिसमें वह सफल रहे। मेयर दीपक बाली को शहरवासियों से विकास करने के वादे करने पड़े यह इस बात का प्रमाण है कि पिछले बीस वर्षों में शहर विकास के लिए तरसता रहा। पिछले वर्ष की बरसात में खुद पूर्व विधायक की कोठी का जलमग्न होना अपने आप में शहर के विकास की पोल खोलता नजर आया था।
शहर की समस्याओं में प्रमुख रहीं सड़के गड्ढों से भरी, यातायात व्यवस्था अव्यवस्थित है, जल निकासी और नालियों की हालत बदतर है और सबसे बड़ी बात यह है कि औद्योगिक क्षेत्र में नई निवेश योजनाएं ठप पड़ी हैं। यहाँ तक कि नगर निगम में कुछ योजनाओं और परियोजनाओं के लिए आया करोड़ों रूपया लैप्स होने की कगार पर था।
काशीपुर कभी औद्योगिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध था। बड़ी कंपनियों ने यहाँ उद्योग लगाये थे जो धीरे-धीरे या तो बंद हो गये या फिर यहां से कारोबार समेट कर चले गए। उद्योगों के रहते क्षेत्र में रोजगार की भरपूर संभावनाएं थीं। लेकिन कोई ठोस नीति प्रयास नहीं हुए जिससे नई इकाइयाँ स्थापित हो पातीं या बंद हो रही इकाइयों को सहायता मिलती।परिणामस्वरूप स्थानीय युवाओं के लिए न तो पर्याप्त रोजगार सृजन हुआ, न ही स्वरोजगार को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास हुए। काशीपुर में एक उच्च स्तरीय सरकारी अस्पताल की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है, लेकिन यह मांग केवल चुनावी वादों तक ही सीमित रही। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।
जनप्रतिनिधि और जन के बीच संवादहीनता की वजह से जनता केवल वोट देते समय अपने जनप्रतिनिधि से सीधे संवाद करती थी। और जीत के बाद इस संवाद की कोई जरूरत नहीं समझी गयी। कार्यालयों में बैठकर प्रेस कांफ्रेंस कर जनसंवाद की औपचारिकता पूरी कर ली गई। हालांकि महापौर बनने के बाद दीपक बाली ने इस संवादहीनता को सिरे से समाप्त कर एक नयी परिपाटी शुरू कर दी।
इससे पहले न तो नियमित जनसंवाद शिविर हुए, न ही समस्याओं को लेकर कोई सक्रिय मॉनिटरिंग तंत्र विकसित किया गया। अनेक बार जनता को केवल कोरे आश्वासन मिलते रहे।
यहां के नेताओं ने बड़े नेताओं से तो संपर्क खूब बनायें लेकिन जनता से संपर्क बना पाने में वह असफल साबित हुये। उत्तराखंड की राजनीति में उनका दबदबा भी रहा। परंतु यह दुखद है कि अपने प्रभाव का उपयोग वे काशीपुर के लिए नहीं कर पाए।
बस काशीपुर के जनप्रतिनिधियों की यही चूक शहर के लिए नुकसानदेह हुई। काशीपुर जैसी संभावनाओं से भरी भूमि को नेतृत्व की स्पष्ट दृष्टि और सक्रियता की आवश्यकता थी, जो दुर्भाग्यवश नहीं मिल पाई। अब समय था कि जनता ऐसे नेतृत्व को चुने जो केवल वादे न करे, बल्कि धरातल पर परिणाम देने वाला हो। और कहना गलत नहीं होगा कि दीपक बाली ने इसी बात को महसूस किया और अपने उच्च नेताओं से संपर्क व प्रभाव का उपयोग महज फोटो और सेल्फी वाला नेता बनने के बजाय शहर की विकास की गति को आगे बढ़ाने के लिए किया।

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