मुर्दों के बीच ज़िंदा मर्द: सम्भल में कैंडल मार्च पर सवाल खड़े करती गिरफ्तारी

हाल ही में सम्भल में हुई हिंसा के बाद प्रशासन का रवैया लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। जब संविधान हर नागरिक को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, तब शांति पूर्वक कैंडल मार्च निकालने पर प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी न केवल असंवैधानिक है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को भी आहत करती है।

कैंडल मार्च, जो हिंसा और नफरत के खिलाफ एक प्रतीकात्मक कदम होता है, उसे सम्भल में अपराध की तरह देखा गया। पुलिस द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करना इस बात को स्पष्ट करता है कि प्रशासन जनता की आवाज़ सुनने के बजाय उसे दबाने की कोशिश में लगा हुआ है। यह घटना केवल संविधान के उल्लंघन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के भविष्य को लेकर एक गंभीर चेतावनी भी देती है।

संविधान में दिए गए अधिकार तभी जीवित रह सकते हैं, जब उन्हें संरक्षित किया जाए। जो लोग इन अधिकारों की रक्षा के लिए आगे बढ़ते हैं, वे समाज के लिए उम्मीद की किरण हैं। ऐसे लोग “मुर्दों के बीच ज़िंदा” हैं, जो अन्याय के खिलाफ खड़े होते हैं और समाज से यह सवाल पूछते हैं कि क्या हम एक ऐसा लोकतंत्र चाहते हैं, जहाँ विरोध करना भी अपराध हो जाए?

सम्भल की यह घटना केवल एक प्रशासनिक कार्यवाही नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का विषय है। अगर आज शांति और सौहार्द के प्रतीकों को दबाने की कोशिश हो रही है, तो कल विरोध के अधिकार की हत्या कोई बड़ी बात नहीं होगी।

संविधान का सम्मान और नागरिक अधिकारों की रक्षा केवल प्रशासन की ही नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है। ज़िंदा समाज वही होता है, जहाँ हर व्यक्ति अपनी बात स्वतंत्रता से कह सके और लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण हो। सम्भल की यह घटना हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र की बुनियाद को बचाने के लिए हमें सतर्क रहना होगा और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी।

By Mohd Nafees

संपादक – सच्चाई की जीत पता – Nafees Screen Printers, Near Bilal Masjid, Ward no. 10, Ali Khan, Kashipur 244713 संपर्क – 9837427792 व्हाट्सप्प – 9837427792 ईमेल – sachchaikijeet7@gmail.com