(सगीर चंकी पांडे, रिपोर्टर) उत्तर प्रदेश सरकार जल्दी ही अधिकारीयों कर्मचारियों के नकारापन से तंग होकर उत्तर प्रदेश में सिस्टम सुधार का संविदा प्रयोग करने जा रही है यह प्रयोग अधिकारियों कर्मचारियों की कामचोरी के कारण किया जा रहा है या सरकार की सीनाजोरी के कारण यह तो उत्तर प्रदेश की 22 करोड़ जनता ही बता सकती है फिलहाल मेरा दावा है कि सरकार का यह प्रयोग न सिर्फ उत्तर प्रदेश के विकास में वरदान बनेगा, बल्कि कामचोर अधिकारियों कर्मचारियों के लिए भी अच्छा खासा सबक साबित होगा। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकारी ही नहीं भारत सरकार भी एक-एक करके कई बड़े विभागों का निजी करण करने जा रही है और कई विभागों का कर भी चुकी है परंतु उत्तर प्रदेश में होने जा रहे संविदा प्रयोग की जानकारी जब मुझे लगी तो अपार खुशी हुई। लंबे समय से मैं ही नहीं सरकार का भी प्रत्येक व्यक्ति इस बात को भलीभांति जानता है की अधिकारियों की लापरवाही व कर्मचारियों की कामजोरी के कारण ही अच्छी सोच रखने वाली सरकारों को विदाई लेनी पड़ी। अब उत्तर प्रदेश में ही ले लो ऐसे अधिकतर विभाग हैं जिनमें भले ही प्रतिमाह मिलने वाली सैलरी लाखों से ऊपर पहुंच रही हो, लेकिन काम के मामले में शायद ही कोई ऐसा विभाग हो, जिसने सैलरी से आधा भी काम करने में सफलता हासिल की हो। बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है की हमारे देश को आजाद हुए 70 साल से ज्यादा होने जा रहे हैं लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि आज न सिर्फ बेसिक शिक्षा बल्कि चिकित्सा विभाग,व चिकित्सा शिक्षा की भी खस्ता हालत है।मै यह भी दावे के साथ कह सकता हूं कि बेसिक शिक्षा पर भले ही प्रति वर्ष भारी भरकम बजट खर्च होता हो लेकिन क्वालिटी के नाम पर पूरी तरह से बेकार साबित हुई है। प्राइमरी स्कूलों के आधे से ज्यादा शिक्षक 70,000 से ऊपर सैलरी पाते होंगे जिनमें से बहुत से तो ऐसे हैं जो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री यहां तक कि मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक का नाम नहीं जानते। यदि वह अपने विभाग के ही बेसिक शिक्षा मंत्री का नाम न बता पाए तो चौंकाने वाली बात नहीं है। यही हाल उत्तर प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था का है जहां न सिर्फ माफियाओं का बोलबाला है बल्कि एमबीबीएस करने के बाद भगवान का रूप पाने वाले डॉक्टर भी कमीशन खोरी के चक्कर में मरीज की जान से खिलवाड़ करने में संकोच नहीं करते। चाहे सपा सरकार रही हो या बसपा की सरकार अथवा वर्तमान में योगी सरकार कार्यरत हो, लेकिन चाह कर भी कोई सरकार अपने समय में प्रदेश की चिकित्सा व शिक्षा व्यवस्था को ठीक नहीं कर सकी। मजेदार बात तो यह रही कि यदि कभी किसी ने इन विभागों को सही करने का प्रयास भी किया तो इसके कर्मचारी आंदोलन पर उतारू हो कर सरकार को ही ब्लैकमेल करने लगे। केवल बेसिक शिक्षा और चिकित्सा शिक्षा ही नहीं उत्तर प्रदेश का बिजली विभाग भी इससे अछूता नहीं है मैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व उनकी सरकार के नुमाइंदों को बधाई देना चाहता हूं कि उनके कार्यकाल में इस तरह का अभिनव प्रयोग होने जा रहा है जिसमें किसी भी कर्मचारी को पहले 5 साल संविदा पर काम करना होगा उसके बाद ही वह स्थाई नियुक्ति पा सकेगा। यही हाल भारत सरकार का है जिसके द्वारा निजी करण के प्रयोग पर भले ही कुछ लोग उसे सरकार की हठधर्मिता कहें या मौका परस्ती अथवा सीनाजोरी लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इनको निजी कंपनी को दिए बिना देश का विकास होने वाला नहीं है। विभागों में बढ़ती दिन प्रतिदिन की लापरवाही देश की जनता के लिए नासूर बनती जा रही है। हालांकि इसका खामियाजा भी उत्तर प्रदेश या भारत सरकार को भुगतना पड़ सकता है लेकिन भारी भरकम सैलरी पाकर बीएसएनएल, इंडियन आयल, रेलवे जैसे विभागों को बर्बाद करने वाले अधिकारियों कर्मचारियों का इलाज शायद इससे अच्छा नहीं हो सकता। मैं तो कहता हूं कि भारत सरकार को सभी विभागों का निजी करण कर देना चाहिए ताकि भारी भरकम सैलरी पाकर खुद को खुदा मानने वाले लापरवाह व नकारा कर्मचारियों पर लगाम लगाई जा सके। मैं यह भी दावे के साथ कह सकता हूं कि यदि बीएसएल के अधिकारियों ने तमाम सुख सुविधाएं होने के बावजूद सही ढंग से काम किया होता तो आज बीएसएनएल न सिर्फ देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पुरस्कार पा रहा होता। यही हाल रेलवे का सबके सामने हैं जहां आए दिन दुर्घटना होना आम बात हो गई है तो भारी भरकम कर्मचारियों द्वारा ड्यूटी में लापरवाही खुलेआम देखी जा सकती है। यदि उत्तर प्रदेश सरकार सिस्टम सुधार के लिए संविदा का प्रयोग कर पाई तो मेरी नजर में यह सीनाजोरी नहीं बल्कि काम चोरी पर सरकार का बड़ा हमला होगा। मैं तो कहता हूं उत्तर प्रदेश सरकार को पुलिस विभाग का भी निजीकरण कर देना चाहिए ताकि कानून व्यवस्था से खिलवाड़ और सरकार की छिछालेदार करके जनता में असुरक्षा का एहसास कराने वाले पुलिसकर्मियों पर भी लगाम लग सके। आज उत्तर प्रदेश का शायद ही कोई जिला ऐसा होगा जहां पुलिस विभाग में जमकर भ्रष्टाचार न किया जाता हों। कई ज़िले तो ऐसे हैं जहां बाकायदे थाना अध्यक्ष बनाने का रेट निर्धारित है तो पुलिसकर्मियों के तबादले का भी मूल्य लिया जाता है। जहां थाना अध्यक्ष बनने में लाखों रुपए खर्च करने पड़ेंगे तो संबंधित थाना अध्यक्ष उसकी पूर्ति कहां से करेगा जो बिगड़ती कानून व्यवस्था के लिए सोचने का विषय है। लेकिन मुख्यमंत्री द्वारा भ्रष्ट अधिकारियों के विरुद्ध की जा रही कार्यवाही की प्रशंसा अवश्य होनी चाहिए।

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