ये कहानी है बिजनेसमैन रहे 90 साल के मोहन लाल की. पंजाब में रक्षा मंत्रालय की तरफ से मोहन लाल की जमीन 1970 में अधिग्रहित की गई थी लेकिन सरकार की तरफ से जो पैसा अधिग्रहण के एवज में मुआवजे के तौर पर किसानों को दिया जा रहा था, उससे किसान खुश नहीं थे, क्योंकि वह रकम बेहद कम थी.
सोचिए कि किसी व्यक्ति को इंसाफ के लिए 50 साल का लंबा इंतजार करना पड़े, और न्याय मिलते-मिलते उम्र 90 साल हो जाए, तो फिर कोर्ट कचहरी के उसे सालों-साल कितने चक्कर लगाने पड़े होंगे, और कितने पापड़ बेलने पड़े होंगे, इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है.
ये कहानी है बिजनेसमैन रहे 90 साल के मोहन लाल की. पंजाब में रक्षा मंत्रालय की तरफ से मोहन लाल की जमीन 1970 में अधिग्रहित की गई थी लेकिन सरकार की तरफ से जो पैसा अधिग्रहण के एवज में मुआवजे के तौर पर किसानों को दिया जा रहा था उस से किसान खुश नहीं थे क्योंकि वह रकम बेहद कम थी.
इसको लेकर मोहन लाल ने पेशावर में मुआवजे की रकम बढ़ाने को लेकर कोर्ट में मामला डाला जिसके बाद यह मामला पंजाब हाई कोर्ट में ट्रांसफर हो गया. सालों बीतने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा जहां सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में मामले का निपटारा करते हुए मोहन लाल की जमीन के 70 फीसदी मुआवजे की रकम बढ़ाकर सरकार को तुरंत मुआवजा देने का आदेश दिया.
लेकिन 2010 में हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने के बजाय सरकारी विभाग आपस में एक-दूसरे को फाइल ही घुमाते रहे. जब 2017 में भी बुजुर्ग मोहन लाल को मुआवजा नहीं मिला तो उन्होंने आरटीआई के माध्यम से देरी का कारण जानना चाहा, तो सरकारी विभागों की लापरवाही साफ नजर आ गई.
इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन न होने को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका लगाई. जिस पर हाई कोर्ट ने बुजुर्ग को 4 हफ्ते के भीतर मुआवजे की रकम चुकाने के आदेश दिए हैं. इतना ही नहीं कोर्ट ने सरकार पर 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है. ये जुर्माना 2010 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मुआवजा न देने और उससे बुजुर्ग को हुई तकलीफ के लिए लगाया गया है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि सरकार अगर किसी की भी जमीन अधिग्रहित करती है तो ऐसी सूरत में उस व्यक्ति को मुआवजा हासिल करने का पूरा अधिकार है. अगर किसी व्यक्ति को इसके लिए सालों-साल कचहरी के चक्कर लगाने पड़ें तो ये सरकारी तंत्र की विफलता है. कोर्ट ने अपने आदेश में माना है कि बुजुर्ग मोहन लाल को मुआवजा देने में सरकारी विभागों ने लापरवाही बरतते हुए देरी की.
हाई कोर्ट में मोहन लाल का केस लड़ने वाले वकील तरुण राणा ने आजतक से बात करते हुए कहा कि इतने सालों में बुजुर्ग मोहन लाल को कोर्ट कचहरी में अपने मामले को लड़ते हुए इतने पैसे खर्च करने पड़े जितनी शायद इस मुआवजे से भी नहीं मिल पाएंगे. लेकिन हाई कोर्ट से आए आदेश के बाद न्याय मिलने की खुशी में बुजुर्ग मोहन लाल की आंखें खुशी से छलक पड़ीं

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